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अंकुश मारुति शिंदे 17 साल की उम्र में जेल गए थे

इन लोगों का कहना है कि पुलिस ने उन पर तरह-तरह के ज़ुल्म ढाए. बिजली के झटके दिए और बुरी तरह पीटा ताकि वो जुर्म क़बूल कर लें'.
इसके बाद अजीबोगरीब घटना ये हुई कि वारदात की इकलौती चश्मदीद महिला ने भी उन लोगों की थाने में अपराधियों के तौर पर 'शिनाख़्त' कर दी.
2006 में निचली अदालत ने इन सभी को हत्या का दोषी माना और मौत की सज़ा सुना दी. इस मामले की जांच चार अलग-अलग पुलिसवालों ने की थी. मुक़दमे की सुनवाई के दौरान सरकारी वक़ील ने 25 गवाहों के बयान भी दर्ज कराए थे.
इसके बाद अगले एक दशक या उससे भी ज़्यादा समय के दौरान, पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने और फिर सुप्रीम कोर्ट ने, इन सभी लोगों को मुजरिम ठहराने के फ़ैसले को बरक़रार रखा. बॉम्बे हाई कोर्ट ने मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदल दिया. लेकिन, देश की सर्वोच्च अदालत ने इसे पलटते हुए फांसी की सज़ा बहाल कर दी.
अदालतों ने इन लोगों को बेगुनाह साबित करने वाले सबूतों के ढेर को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया.
हां वारदात हुई थी, उस झोपड़ी के अंदर और बाहर जो हाथ के निशान मिले थे, वो शिंदे परिवार के सदस्यों से नहीं मिले थे. उनके ख़ून और डीएनए के नमूने भी लिए गए. मगर, इनकी रिपोर्ट कभी अदालत में नहीं रखी गई.
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2019 को दिए गए अपने फ़ैसले में कहा, ''ख़ून और डीएनए सैंपल के नतीजों से शिंदे भाइयों का जुर्म बिल्कुल भी साबित नहीं होता था''.
चश्मदीदों ने पहले पुलिस को बताया था कि हमलावर हिंदी बोल रहे थे. जबकि शिंदे परिवार के सदस्यों को हिंदी आती ही नहीं. वो मराठी में बात करते हैं.
मुंबई के वक़ील युग चौधरी ने सबूतों की पड़ताल की. उन्हें साफ़ दिखा कि शिंदे परिवार के सदस्यों के ख़िलाफ़ तो कोई सबूत ही नहीं. इसके बाद युग चौधरी ने इन सभी की जान बचाने की लड़ाई क़रीब एक दशक तक लड़ी.
पहले युग चौधरी ने इन सभी की तरफ़ से पहले महाधिवक्ता, फिर राज्यपाल और आख़िर में राष्ट्रपति के यहां दया याचिका दाख़िल की. युग चौधरी ने शिंदे परिवार के इन सदस्यों की तरफ़ से पूर्व न्यायाधीशों की एक चिटठी भी भारत के राष्ट्रपति के पास भिजवाई कि वो उनकी मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदल दें.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अपने फ़ैसले में लिखा है, ''ग़लत तरीक़े से सज़ा पाने वाले इन लोगों को अगर फांसी दे दी जाती, तो देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठ सकते थे''.
इस अनसुलझी वारदात के 16 साल बाद बहुत से सवालों के जवाब अब तक नहीं मिले हैं.
आख़िर अदालतों ने शिंदे भाइयों को किस आधार पर दोषी पाया और मौत की सज़ा सुनाई? उन्हें चश्मदीद के बयान पर भरोसा कैसे हो गया, जबकि वो अपने बयान बदल रही थी. क्या शिंदे भाइयों को इस चश्मदीद के शिनाख़्त परेड में पहचानने के आधार पर ही सज़ा दे दी गई?
वक़ील कहते हैं कि ये एक 'भयंकर अपराध' था. इसलिए पुलिस पर जनता और मीडिया का भारी दबाव था. तो, उन्होंने शिंदे भाइयों को पकड़कर हत्या के केस को सुलझाने का दावा किया और अपनी पीठ थपथपा ली.

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