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चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

'इंडिया टुडे' के संपादक राज चेंगप्पा अपनी किताब 'वेपन ऑफ़ पीस' में लिखते हैं, "परमाणु बम बनाने के मुद्दे पर विक्रम साराभाई और होमी भाभा के विचार बिल्कुल नहीं मिलते थे. भाभा की मृत्यु के पांच महीने बाद जब उन्होंने परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रमुख का काम संभाला तो उन्होंने सबसे पहले भारत के नए-नए परमाणु बम कार्यक्रम को समाप्त करने की तैयारी शुरू कर दी.
परमाणु वैज्ञानिक राजा रामन्ना याद करते हैं कि साराभाई का मानना था कि हथियार के रूप में परमाणु बम बेकार की चीज़ है. वो सिर्फ़ एक कागज़ी शेर है. परमाणु बम के प्रति साराभाई की इस सोच से मोरारजी देसाई बहुत खुश हुए. कई साल बाद जब वो प्रधानमंत्री बन गए तो उन्होंने राजा रामन्ना से कहा, "साराभाई समझदार लड़का था. वो पागल भाभा तो पूरी दुनिया को उड़ा देना चाहता था."
जब विक्रम के सामने भाभा का ये तर्क रखा गया कि परमाणु बम बनाने में बहुत कम ख़र्च होगा तो उनका जवाब था, "आप मुझसे पूछ सकते हैं कि दो गज़ कपड़े की कीमत क्या होगी? लेकिन ये दो गज़ कपड़ा बग़ैर किसी करघे या मिल के तो बनाया नहीं जा सकता."
मल्लिका साराभाई ने ही अपने पिता की चिता को अग्नि दी. विक्रम साराभाई की मां भी वहां मौजूद थीं. जब पुजारी ने जमे हुए घी को टुकड़ों में तोड़ कर चिता में डालना चाहा तो उनकी मां ने कहा, "धीरे से डालो, विक्रम को चोट लग जाएगी."
1974 में चांद के एक क्रेटर का नाम डॉक्टर साराभाई के नाम पर रखा गया. पिछले दिनों भारत ने चंद्रमा पर अपना जो चंद्रयान भेजा है, उसकी नींव कई दशक पहले विक्रम साराभाई ने ही रखी थी.
इंदिरा गांधी विक्रम साराभाई को बहुत मानती थीं. वो उन चंद लोगों में से थे जिन्हें वो उनके पहले नाम से पुकारती थीं. विक्रम के निजी सचिव के आर रामनाथ बताते हैं कि जब भी इंदिरा गांधी उनके शहर में आती थी, उनका काम होता था शहर में उपलब्ध सबसे लाल गुलाबों का 'बुके' तैयार करवाना, जिसे विक्रम साराभाई खुद अपने हाथों से इंदिरा गांधी को दिया करते थे लेकिन 1971 का अंत आते आते इन संबंधों में खटास आनी शुरू हो गई थी.
राज चेंगप्पा 'वेपन ऑफ़ पीस' में लिखते हैं, "भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले नवंबर के आख़िरी सप्ताह में इंदिरा गांधी ने साराभाई को मिलने के लिए बुलाया. उन्होंने उनसे स्पष्ट कहा कि वो उनके नेतृत्व में एक अंतरिक्ष आयोग बनाने जा रही हैं, इसलिए वो परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रमुख का पद छोड़ दें. साराभाई ने अपने आप को तिरस्कृत महसूस किया."
30 दिसंबर, 1971 को विक्रम साराभाई त्रिवेंद्रम के कोवालम बीच गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे. सुबह जब वो सो कर नहीं उठे तो उनके कमरे का दरवाज़ा तोड़ा गया. मच्छरदानी के अंदर वो शांतिपूर्व लेटे हुए थे. उनके सीने पर एक किताब पड़ी हुई थी. जब डाक्टर ने उनकी जांच की तो पता चला कि दो घंटे पहले उनका स्वर्गवास हो चुका था. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 52 साल.
मल्लिका साराभाई याद करती हैं, "मैं शूटिंग कर रही थी अपनी पहली फ़िल्म की, तभी अम्मा का फ़ोन आया डायरेक्टर के पास कि मल्लिका को घर वापस ले आओ. गाड़ी में वापस आते समय मैं सोच रही थी कि अम्मा को कुछ हुआ है. मैं सोच तक नहीं सकती थी कि पापा को कुछ हो सकता है."
"जब मैं घर पहुंची तो नीचे गाड़ियों की कतार खड़ी हुई थी. लोग सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे और रो रहे थे. जब मैं ऊपर गई तो पापा के सेक्रेट्ररी मुझे अंदर ले गए. वहाँ अम्मा बेडरूम में रो रही थी. उन्होंने मुझसे सिर्फ़ इतना कहा, 'मल्लिका पापा इज़ गॉन.' मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि 'पापा गॉन' का मतलब क्या है. उनको कुछ होगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था."
''उन्हें लगा कि इंदिरा गांधी का अब उनमें विश्वास नहीं रहा. श्रीमती गांधी ने कहा कि ये बात सही नहीं है. वो बोलीं, 'अगर आप इसी गति से काम करते रहे तो हम बहुत जल्दी आपको खो देंगे.' साराभाई बहुत निराश हो कर इंदिरा के दफ़्तर से बाहर निकले और उनके कुछ दोस्तों के अनुसार उन्होंने ये भी सोचा कि वो इस्तीफ़ा दे दें. लेकिन भारत-पाकिस्तान युद्ध ने इस संकट को टाल दिया. इससे पहले कि अंतरिक्ष और परमाणु विभाग को विभाजित करने की सार्वजनिक घोषणा होती, विक्रम साराभाई का स्वर्गवास हो गया."

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