इन लोगों का कहना है कि पुलिस ने उन पर तरह-तरह के ज़ुल्म ढा ए. बिजली के झटके दिए और बुरी तरह पीटा ताकि वो जुर्म क़बूल कर लें'. इसके बाद अजीबोगरी ब घटना ये हुई कि वारदात की इकलौती चश्मदीद महिला ने भी उन लोगों की थाने में अपराधियों के तौर पर 'शिनाख़्त' कर दी. 2006 में निचली अदालत ने इन सभी को हत्या का दोषी माना और मौत की सज़ा सुना दी. इस मामले की जांच चार अलग-अलग पुलिसवालों ने की थी. मुक़द मे की सुनवाई के दौरान सरकारी वक़ील ने 25 गवाहों के बयान भी दर्ज कराए थे. इसके बाद अगले एक दशक या उससे भी ज़्यादा समय के दौरान, पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने औ र फिर सुप्रीम कोर्ट ने, इन सभी लोगों को मुजरिम ठहराने के फ़ैसले को बरक़रार रखा. बॉम्बे हाई कोर्ट ने मौत की सज़ा को उम्र क़ैद में बदल दिया. लेकिन, देश की सर्वोच्च अदालत ने इसे पलटते हुए फांसी की सज़ा बहाल कर दी. अदालतों ने इन लोगों को बेगुनाह साबित करने वाले सबूतों के ढेर को पूरी तरह से नज़ रअंदाज़ कर दिया. ज हां वारदात हुई थी, उस झोपड़ी के अंदर और बाहर जो हाथ के निशान मिले थे, वो शिंदे परिवार के सदस्यों से नहीं मिले थे. ...